यह संस्मरण वर्ष 1994 का है जब मैं एम.बी.ए. डिग्री हासिल कर के बाम्बे स्थित एक प्रतिष्ठित प्राईवेट कम्पनी में कार्यरत था जहाँ सैलरी एवं अन्य सुविधाएं भी ईश्वर की कृपा से बहुत ही आकर्षक थी। अचानक मैंने एक दिन रेलवे प्लेटफार्म पर एक विक्षिप्त भूखे को कूड़ेदान से कुछ निकालकर खाते हुए देखा । शायद वह जिन्दगी और भूख से जूझ रहा था, ऐसा मुझे एहसास हुआ। उस दृश्य को देखकर मैं बहुत ममहित हो गया और उसी समय मन में बेसहारों का सहारा बनने की ईश्वरीय प्रेरणा.....
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